Congress MLA's staged walk out from Punjab assembly
Posted: 26 Feb 2009 08:03 PM PST
CHANDIGARH: Punjab Congress party MLA's on Friday staged walk out from Vidhan Sabha during the address of Governor S.F.Rodrigues.
Indian peaceniks return home after visiting Punjab
Posted: 26 Feb 2009 08:01 PM PST
AMRITSAR: Delegation of prominent Indian citizens including journalists, spiritual leader, social activist and film producer who were on peace mission in Pakistan for the last five days, today returned India from Pakistan.
Punjab govt signs MoU with Newziland
Posted: 26 Feb 2009 07:58 PM PST
Waitkere and Amritsar become sister cities CHANDIGARH: A new chapter began in the bilateral relations of Punjab and New Zealand as both entered into two Memorandums of Understanding, declaring Waitkere and Amritsar cities as Sister cities and to provide training to Punjab pilots in New Zealand.
Punjab Governor describes Badal greatest statesman of all times
Posted: 26 Feb 2009 07:53 PM PST
Punjab to have another international airport near LudhianaThe Punjab Governor General SF Rodrigues (Retd.) Friday called for the setting of a true federal system in the country with more financial powers to states as, according to him, “ state governments are best placed to understand , address and tackle local development and economic problems”.
Punjab: Corruption in Mohali Traffic Police-Alarm bells for SSP
Posted: 26 Feb 2009 12:29 AM PST
Confessions of a victim who preferred to pay challan feeCHANDIGARH: We have received an email from Harjaspreet Singh Sohi, a resident of Mohali who claimed that Mohali traffic police demanded bribe from him but he preferred to pay the fine to help state government earn revenue. Is the high profile Deputy Chief Minister Sukhbir Singh Badal and SSP Mohali Jatinder Singh Aulakh pay heed to the grievance of Sohi.
Punjab govt reduced luxury tax on hotels. marriage palaces from 10 to 4 percent
Posted: 25 Feb 2009 11:00 PM PST
Sukhbir Badal announced regularization of unauthorized colonies CHANDIGARH: With an eye on the Lok Sabha poll, Deputy Chief Minister Sukhbir Singh Badal Thursday announced a stimulus package for hospitality and realty sectors of the state by slashing luxury tax to 4% from 10 and 8% in marriage palace and hotels respectively and deferring EDC payment by one year for realty sector.
You are subscribed to email updates from PunjabNewsline News To stop receiving these emails, you may unsubscribe now.
Email delivery powered by Google
Inbox too full? Subscribe to the feed version of PunjabNewsline News in a feed reader.
If you prefer to unsubscribe via postal mail, write to: PunjabNewsline News, c/o Google, 20 W Kinzie, Chicago IL USA 60610
Friday, 27 February 2009
02/03/2009 : Elevés par leur père : comment grandissent-ils ?
02/03/2009 : Elevés par leur père : comment grandissent-ils ?
03/03/2009 : Trois générations sous le même toit : une question de respect
05/03/2009 : Carnets de grossesse : Des enfants rapprochés
06/03/2009 : A 10 ans, il ne sait toujours pas lire
Contribuer
Loisirs
Urgent - Pour les vacances scolaires, vous n’hésitez pas à envoyer vos enfants en colonies de vacances. - Envoyer une contribution par email Autres thèmes de contributions
Forum
Etre père après 60 ans - Répondre
Derniers Dossiers
Père à distance
Certains pères sont amenés à passer le plus clair de leur temps loin de leur domicile... - Plus d'infos
Et aussi
Mon enfant est fan - Plus d'infos
Sécurité routière - Plus d'infos
Les ondes électromagnétiques - Plus d'infos
Familles recomposées
En France, 1,6 million d'enfants vivent dans une famille recomposée. Lire le dossier
Une instit sort de l’école
Laurence Borrel nous raconte l'école maternelle de l'intérieur. Voir son blog
Appel à témoin
Votre enfant fait des grosses bêtises dont certaines auraient pu virer au drame. Témoigner
Chat Régimes
Le 2 mars, de 11h à 12h, Jean-Michel Cohen répond à vos questions. Poser votre question
Aller vers
Vidéos
Contribuer à l'émission
Forums
Tous les dossiers
Bébé,
Couple,
Désir d’enfant,
Ecole,
Enfant,
Famille,
Grossesse & Accouchement,
Loisirs,
Métiers,
Nutrition,
Santé de l’enfant,
Vie quotidienne,
Les sites France Télévisions
France 2
France 3
France 4
France 5
RFO
France tvod
France Télévisions
La Boutique
Le Catalogue
Informations légales - Droits de reproduction et de diffusion réservés © 2008 France Télévisions InteractiveMentions légales et crédits Conditions générales d'achat
Ne plus recevoir cette lettre d’informations
Thursday, 26 February 2009
पेरिस में डुप्लीकेट करते सेजौर देकर सात हज़ार यूरो भी लिए और जेल की यात्रा भी की
पेरिस में डुप्लीकेट इदेंटी कार्ट देकर सात हज़ार यूरो का चुना लगाया और २४ घंटे जेल की यात्रा भी की
पेरिस (धरमवीर नागपाल ) प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार सरदार अमर सिंह बेटा नौरा राम वासी गाव सल्पनी खुरद पोस्ट ऑफिस अजराना कलां जिला कुरुखेतर हरयाणा वासी ने दो पतस खान और रसफ नामी पेरिस के वासिंदों से सात हज़ार यूरो देकर डुप्लीकेट कारते सेजौर प्राप्त करके २४ घंटे फ्रांस की जेल की यात्रा की और दोनों अभियुक्तों को भी करवाई । जब उक्त पतरकार पेरिस मकादम की एक विशेष मीटिंग में बैठा था तो मोबाइल नो: ०६ ३४ २६ ३३ ०८ दुवारा मदद की गुहार मांगी तो उसकी मुलाकात पेरिस १८ दुवारा पोंत दे द्रौया में लेजाया गया जहाँ उसने अपनी बीती गाथा सुनाई उसका पासपोर्ट अभी भी उन लोगो के पास हे जिन्होनो फ्राड में सात हजार यूरो लिया था और वेरवे की जानकारी ली जा रही हे ।
पेरिस (धरमवीर नागपाल ) प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार सरदार अमर सिंह बेटा नौरा राम वासी गाव सल्पनी खुरद पोस्ट ऑफिस अजराना कलां जिला कुरुखेतर हरयाणा वासी ने दो पतस खान और रसफ नामी पेरिस के वासिंदों से सात हज़ार यूरो देकर डुप्लीकेट कारते सेजौर प्राप्त करके २४ घंटे फ्रांस की जेल की यात्रा की और दोनों अभियुक्तों को भी करवाई । जब उक्त पतरकार पेरिस मकादम की एक विशेष मीटिंग में बैठा था तो मोबाइल नो: ०६ ३४ २६ ३३ ०८ दुवारा मदद की गुहार मांगी तो उसकी मुलाकात पेरिस १८ दुवारा पोंत दे द्रौया में लेजाया गया जहाँ उसने अपनी बीती गाथा सुनाई उसका पासपोर्ट अभी भी उन लोगो के पास हे जिन्होनो फ्राड में सात हजार यूरो लिया था और वेरवे की जानकारी ली जा रही हे ।
Madam Ann marrie shake hand with Dharamvir Nagpal before visited to INDIA
Muni Chetan dev Ji was a great Social Worker of Rajpura Punjab India like beer ji of Patiala. Everybody was call him muni ji. I know him before 1967 w
Muni Chetan dev Ji was a great Social Worker of Rajpura Punjab India like beer ji of Patiala। Everybody was call him muni ji. I know him before 1967 when Muni Ji and Late Shri Piyara lal Ji Khurana (father of Shri Raj Khurana MLA Rajpura) was arrange himself a free medical eye relief camp in the Arya Samaj Mandir Rajpura Town and in the time of closing ceremoney of Eye relief Camp Sh. Hans Raj Sharma former Finance Minister of Punjab Chandigarh was a Chief Guest and the Lions Club of International Rajpura was arrange everything for the help of Muni Ji and start a free eye relief camp two time in a year. Smt late Premi Bai w/o late Muni Ji and Radha Devi w/o late shri Piyara Lal Khurana boths was help and serve in the time of eye relief camp day and night and they got all time peace of mind and happyness. I cannot forget their friendship for the service of social.Every Year in the day of Diwali Muni Ji was arrange a Sobha Yatra for the those peoples whose sleeping and not awake up for social service and
हियर इन पेरिस नजदीक मेट्रो लाइन ५ बोबिग्नी के नजदीक इक मिनी ट्रक में कुछ सोशल वोर्केर तारीख २६ फरवरी रात को नोऊ बगएजे जरुरत मंद लोगो को और भूखे लोगो को फल दूध और खाना बाटते देखे जब मैंने उनसे मीडिया के लिए जानकारी हासल की तो उन्होंने जानकारी देते हुए कहा के वोह फ्रांस में इस तरेह की सेवा कर के बहुत खुशी महेस्सूस करते हे और उनकी सामाजिक संस्था का नाम इम्मुस हे और उनका टेलीफोन नॉ ०१ ४३ ०० ०५ ५२ उनकी खाना बटने वाली गार्री लिखा हुआ था मेरी जानकारी में इस सामाजिक संस्था के संस्थापक बापू अब्बू पेर्रे जी थे जिन्होंने संसार के दुसरे विशव युद्ध में जख्मियों का इलाज किया थे और फ्रांस से ८०० किलोमीटर दूर अस्ताविल्ले नाम की संस्था में उनकि बिस्तर जूते और सभी परकार की यादगारी की चीजे एक स्पेशल कमरे में राखी हुई हे उनके कामो को और समाज सेवा को सलूट करते हुए ये जानकारी भी देना अपना पहेला फ़र्ज़ समजता हु के पेरिस में सिते आंद्रे जकोमेत नमक सामाजिक संस्था के संस्थापक एंड मुखी ने गरीब और बेसहारा लोगो की मदद के लिए ये संस्था खोली थी और इस संस्था के कुछ स्वार्थी लोग संस्था के अन्दर अल्कोहल बीरी सिगरेट मरीजो को पिलाते हे और खुद भी पीते हे !
बीते ६ महीनो में ८ मरीजो की मौत हो चुकी हे जो जकोमेत के निर्देशक और उप निर्देशिका के लिए आम बात हे बीते २ सालो से इस संस्था में मेरे को भी फ्रांस के कानून के मुताबिक काउंसिल दी विया सोशल नामक संस्था का मेंबर चुना गया था और आज जब मैंने अपना इस्तीफा इस संस्था की उप निर्देशिका को दिया तो उसने मेरा इस्तीफा लेने से इनकार करते हुए कहा के ये नामुमकिन हे बहुत ही शर्म की बात हे जो इस संस्था में शराब और सिगरेट और कई परकार के दृग्स पिने की खुली छूट दे राखी हे !
धर्मवीर नागपाल
मेंबर काउंसिल दे विया सोशल
१७ बौल्वार्ड ने ७५०१८ पेरिस
हियर इन पेरिस नजदीक मेट्रो लाइन ५ बोबिग्नी के नजदीक इक मिनी ट्रक में कुछ सोशल वोर्केर तारीख २६ फरवरी रात को नोऊ बगएजे जरुरत मंद लोगो को और भूखे लोगो को फल दूध और खाना बाटते देखे जब मैंने उनसे मीडिया के लिए जानकारी हासल की तो उन्होंने जानकारी देते हुए कहा के वोह फ्रांस में इस तरेह की सेवा कर के बहुत खुशी महेस्सूस करते हे और उनकी सामाजिक संस्था का नाम इम्मुस हे और उनका टेलीफोन नॉ ०१ ४३ ०० ०५ ५२ उनकी खाना बटने वाली गार्री लिखा हुआ था मेरी जानकारी में इस सामाजिक संस्था के संस्थापक बापू अब्बू पेर्रे जी थे जिन्होंने संसार के दुसरे विशव युद्ध में जख्मियों का इलाज किया थे और फ्रांस से ८०० किलोमीटर दूर अस्ताविल्ले नाम की संस्था में उनकि बिस्तर जूते और सभी परकार की यादगारी की चीजे एक स्पेशल कमरे में राखी हुई हे उनके कामो को और समाज सेवा को सलूट करते हुए ये जानकारी भी देना अपना पहेला फ़र्ज़ समजता हु के पेरिस में सिते आंद्रे जकोमेत नमक सामाजिक संस्था के संस्थापक एंड मुखी ने गरीब और बेसहारा लोगो की मदद के लिए ये संस्था खोली थी और इस संस्था के कुछ स्वार्थी लोग संस्था के अन्दर अल्कोहल बीरी सिगरेट मरीजो को पिलाते हे और खुद भी पीते हे !
बीते ६ महीनो में ८ मरीजो की मौत हो चुकी हे जो जकोमेत के निर्देशक और उप निर्देशिका के लिए आम बात हे बीते २ सालो से इस संस्था में मेरे को भी फ्रांस के कानून के मुताबिक काउंसिल दी विया सोशल नामक संस्था का मेंबर चुना गया था और आज जब मैंने अपना इस्तीफा इस संस्था की उप निर्देशिका को दिया तो उसने मेरा इस्तीफा लेने से इनकार करते हुए कहा के ये नामुमकिन हे बहुत ही शर्म की बात हे जो इस संस्था में शराब और सिगरेट और कई परकार के दृग्स पिने की खुली छूट दे राखी हे !
धर्मवीर नागपाल
मेंबर काउंसिल दे विया सोशल
१७ बौल्वार्ड ने ७५०१८ पेरिस
Bonjour,
Bonjour,
Si vous avez des difficultés pour visualiser ce message, cliquez sur le lien suivant : Pour être sûr(e) de toujours recevoir les informations de La Française des Jeux, nous vous recommandons d'ajouter l'adresse "actu@lfdj.com" à votre carnet d'adresses.
VVous pouvez accéder au jeu Dédé en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/dede
Vous pouvez accéder au jeu XIII en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/xiii
Vous pouvez accéder au jeu Bingo en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/bingo
Vous pouvez accéder au jeu keno en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/keno
Si vous avez des difficultés pour visualiser ce message, cliquez sur le lien suivant : Pour être sûr(e) de toujours recevoir les informations de La Française des Jeux, nous vous recommandons d'ajouter l'adresse "actu@lfdj.com" à votre carnet d'adresses.
VVous pouvez accéder au jeu Dédé en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/dede
Vous pouvez accéder au jeu XIII en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/xiii
Vous pouvez accéder au jeu Bingo en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/bingo
Vous pouvez accéder au jeu keno en cliquant sur le bouton "JOUER EN LIGNE" ou en recopiantl'adresse suivante dans votre navigateur : http://mail.fdjeux.com/keno
La Petite République
La Petite République
Droits de l’homme et lutte contre le terrorisme, un état des lieux inquiétant
Posted: 25 Feb 2009 03:24 AM PST
Sept années après les attentats du 11 septembre 2001, alors que la planète vient à peine de fêter le 60e anniversaire de la déclaration universelle des droits de l’homme, un comité composé de huit éminents juristes a présenté la semaine dernière à Genève ses conclusions concernant le recul des droits de l’homme au prétexte de la lutte contre le terrorisme. Le document, intitulé « Assessing damage, Urging Action », qui totalise 213 pages démontre clairement qu’il y a une érosion sans précédent des droits humains fondamentaux face à la toute puissance de certains États dans la lutte qu’ils mènent contre le terrorisme. Dés lors, les sages appellent la communauté internationale à un sursaut salvateur face à ces dérives multiples et importantes.
À l’initiative de la Commission Internationale de Juristes, l’enquête a été menée trois années durant aux quatre coins du monde, puisque conduite dans plus de quarante pays au total. Les « huit éminents juristes » ont recueilli une multitude de témoignages auprès d’un panel d’individus appartenant au champ politique, associatif, universitaire, juridique, mais encore de la sécurité, afin d’étayer leur thèse qui constate un recul inquiétant des libertés fondamentales dans nombre de nos États dits de droit.
Pour rappel, un État de droit -à contrario d’un État policier- se défini comme «un système institutionnel dans lequel la puissance publique est soumise au droit». Apportant une précision essentielle, Hans Kelsen, juriste autrichien du début du 20e siècle, y ajoutera la notion de hiérarchie des normes afin de donner une plus grande cohérence au système. Aussi l’édifice présuppose trois impératifs pour être efficient, à savoir: La hiérarchie des normes, l’égalité de tous les citoyens devant la règle de droit, et l’indépendance du système judiciaire. Certes, si le modèle reste en partie théorique il n’en demeure pas moins que les régimes qui se veulent démocratiques doivent mettre en œuvre ce type d’organisation afin que les droits fondamentaux des citoyens soient objectivement garantis [1]. Force est de constater que, même si le modèle reste perfectible, des progrès incontestables ont été réalisés depuis la fin des principaux régimes monarchiques. Mais, il faut aussi se souvenir que l’existence de tels principes fondamentaux n’aura pas empêché au fascisme de prospérer en Europe, ni aux dictatures communistes de régner sans partage sur une grande partie du monde des décennies durant. En outre, nombre de nations contemporaines font fi de ces règles essentielles pourtant admises par une large majorité d’États, foulant aux pieds les libertés individuelles les plus vitales.
Pour autant, le présent rapport s’attache ici à démontrer que c’est cet ensemble complexe, nommé démocratie, qui se trouve aujourd’hui menacé à certains égards lorsqu’il s’agit de lutter contre les affres du terrorisme international, plus particulièrement islamiste, puisque largement stigmatisé depuis le 11 septembre 2001. Rappelons-nous en premier lieu les lois d’exceptions votées par l’administration Bush au lendemain des attentats [2], alors que le peuple américain dans sa grande majorité acquiesçait largement ce rétrécissement de ses libertés individuelles car la sûreté de la nation était menacée. Pire encore, suite à une propagande politique bien menée, la nation américaine dans sa grande majorité a, de fait, ratifié le droit d’envahir les nations déclarées ennemies. C’est d’ailleurs ici le socle sur lequel repose toute la dialectique du discours contre-terroriste qui vend au peuple plus de sécurité pour tous contre moins de libertés individuelles pour chacun, et le sujet de droit de se soumettre bien volontiers à cela en oubliant bien vite que tous les outils juridiques existaient en amont pour arriver à combattre ce front [3]. À ce titre, Arthur Chaskalson de rappeler que «Les normes juridiques adoptées avant le 11 septembre restent extrêmement solides, efficaces et parfaitement adaptées pour répondre aux menaces actuelles», et que s’il n’est pas question de mésestimer la lutte contre le terrorisme, toutefois ce dernier de souligner avec force que «les mesures qu’ils ont adoptées constituent des atteintes aux droits de l’homme bien plus graves qu’on ne pourrait l’imaginer».
Déjà, en 2005, Nicholas Howen, alors secrétaire général du la CIJ, redoutait un effondrement de certaines démocraties sous couvert de la lutte contre le terrorisme. Et les exemples sont nombreux, ce dernier évoquant les cas emblématiques de la Colombie ou du Népal, deux États qui luttent au moyen de lois d’exceptions contre certaines franges d’opposition armée à leur régime. Mais, Nicholas Howen d’évoquer aussi l’assimilation de certains mouvements sociaux à des agissements terroristes comme ce fût le cas en France pour l’affaire du détournement des ferries Corsica. Depuis, d’autres situations similaires ont pu confirmer cette crainte, et c’est aussi ce que met en avant le rapport rendu la semaine dernière.
Bien évidemment, l’illustration extrême des dérives commises au non de la lutte contre le terrorisme s’incarne diaboliquement dans les deux centres de rétentions les plus célèbres gérés par l’administration nord- américaine: Guantanomo et Abou Graïb. Tortures, humiliations, procédure et droit d’exception, opacité et autres perversions d’un système abjecte, inhumain, et outrepassant largement toutes les limites posées par un État de droit. De plus, et chacun le sait, quantité de personnes qui sont, ou ont été détenues dans ces lieux, sont complètement innocentes. C’est notamment le cas de Binyam Mohamed, éthiopien détenu à Guantanamo pendant plus de quatre années sans raison aucune, et remis en liberté ce-jour. Par ailleurs, la situation de la prison de Bagram , située sur le territoire afghan demeure tout aussi préoccupante puisque l’administration Obama vient de signifier son refus d’octroyer aux détenus le droit de contester leur détention devant une juridiction civile.
Dans ce sens, Mary Robinson, qui préside actuellement aux destinées de la CIJ, affirme avec gravité «qu’une atmosphère de secret entoure la détention et l’interrogatoire des personnes soupçonnées d’activités terroristes, ce qui favorise le recours à la torture et aux mauvais traitements et que partout dans le monde, les services de renseignement ont acquis un pouvoir grandissant, et ils sont souvent dispensés de rendre des comptes. Un accès rapide aux tribunaux et aux avocats doit être garanti pour éviter de tels abus». Cela ne saurait être contesté et l’affaire récente de Tarnac corrobore tout à fait cet état de fait. Julien Coupat, le principal protagoniste reste à ce-jour encore embastillé, car mis en examen suite à une inculpation pour «direction d’une structure terroriste», alors que le principal témoignage à charge est frappé du sceau de la mythomanie. Aussi, la France n’est pas en reste en matière de lois liberticides dictées par l’impérative lutte contre le terrorisme rampant.
Alors, il nous faut rappeler avec force les propos tenus devant la presse par ce collectif de juristes internationaux: «Lutter contre Al-Qaida n’implique pas de tordre le cou aux droits fondamentaux. Il est capital d’adapter les lois liées à la lutte contre le terrorisme aux normes internationales. Les gouvernements, même les plus démocratiques, s’en sont dangereusement éloignés depuis les attaques du 11 septembre 2001. Il est aujourd’hui urgent de redresser le cap afin d’éviter des dégâts irrémédiables». Ainsi, les événements récents du Proche-Orient démontrent toute l’actualité de ce propos, l’État israélien ayant largement dépassé ses prérogatives au prétexte de lutter contre le mouvement Hamas désigné comme terroriste, et cela avec le soutien sans équivoque des deux assemblées législatives américaines [4].
Puis, les juristes scrutateurs de nous renvoyer aux conclusions sévères, et recommandations essentielles, faites au chapitre 7 de leur rapport, afin de préserver les libertés fondamentales du plus grand nombre.
Avant tout, «les éminents juristes» rappellent l’importance du droit international en insistant sur la validité de la déclaration universelle des droits de l’homme, mais aussi du droit humanitaire pour gérer et réguler les conflits entre les nations, alors qu’ils déplorent l’érosion de ces deux sources juridiques.
En outre, ils insistent sur l’impérieuse nécessité de respecter les principes du droit pénal commun auquel doivent se soumettre les différents services de renseignements dont le fond de commerce est essentiellement alimenté par les conflits de basse intensité. Par ailleurs, le panel de juristes insiste sur la nécessité d’une transparence minimum des procédures tout en stigmatisant la concentration excessive du pouvoir dans les mains de l’exécutif. Puis, dans leurs conclusions, les juristes internationaux évoquent le rôle indispensable que doivent jouer les systèmes judiciaires, ainsi que tous les professionnels de la justice, dans le traitement des affaires de terrorisme, sans oublier la société civile qui doit aussi s’impliquer dans cette matière, notamment en informant le public.
In fine, les spécialistes de décliner leurs conclusions sous la forme de 9 recommandations faites aux États, ainsi qu’aux instances internationales, afin de réparer les dommages causés mais encore de prévenir toute nouvelle dérive que pourrait justifier la lutte contre le terrorisme.
C’est donc un travail essentiel que viennent de livrer au monde ces juristes impartiaux, même s’il faut reconnaître que l’ouvrage n’a pas force de loi, toutefois son poids moral et historique ne saurait être désormais nié. De plus, n’est-on pas en droit de se demander si, au rang des insanités de ce monde, le terrorisme figure vraiment en haut du tableau?
Hans Lefebvre
[1] État de droit:
http://www.aix-mrs.iufm.fr/formations/filieres/ecjs/productionaixprem/etatdroit.html
http://www.droitconstitutionnel.net/etatdedroit.html
[2] USA Patriot act voté le 25 octobre 2001
[3] La constitution: une arme efficace dans la lutte contre le terrorisme? Carolina Cerda-Guzman
[4] Lire l’éditorial de Serge Halimi intitulé « Abandon de peuple », in Le Monde diplomatique, février 2009.
Articles en lien:
Conférence d'Alain Gresh : L’évolution au Moyen-Orient entre Etats-Unis et Europe
Une bien pauvre justice française
Internet sous surveillance
Le mariage de Sarkozy troublé par l’ambassadeur israélien
Sarkozy champion des désintégrations / discrimination des musulmans
You are subscribed to email updates from La Petite République To stop receiving these emails, you may unsubscribe now.
Email delivery powered by Google
Inbox too full? Subscribe to the feed version of La Petite République in a feed reader.
If you prefer to unsubscribe via postal mail, write to: La Petite République, c/o Google, 20 W Kinzie, Chicago IL USA 60610
Droits de l’homme et lutte contre le terrorisme, un état des lieux inquiétant
Posted: 25 Feb 2009 03:24 AM PST
Sept années après les attentats du 11 septembre 2001, alors que la planète vient à peine de fêter le 60e anniversaire de la déclaration universelle des droits de l’homme, un comité composé de huit éminents juristes a présenté la semaine dernière à Genève ses conclusions concernant le recul des droits de l’homme au prétexte de la lutte contre le terrorisme. Le document, intitulé « Assessing damage, Urging Action », qui totalise 213 pages démontre clairement qu’il y a une érosion sans précédent des droits humains fondamentaux face à la toute puissance de certains États dans la lutte qu’ils mènent contre le terrorisme. Dés lors, les sages appellent la communauté internationale à un sursaut salvateur face à ces dérives multiples et importantes.
À l’initiative de la Commission Internationale de Juristes, l’enquête a été menée trois années durant aux quatre coins du monde, puisque conduite dans plus de quarante pays au total. Les « huit éminents juristes » ont recueilli une multitude de témoignages auprès d’un panel d’individus appartenant au champ politique, associatif, universitaire, juridique, mais encore de la sécurité, afin d’étayer leur thèse qui constate un recul inquiétant des libertés fondamentales dans nombre de nos États dits de droit.
Pour rappel, un État de droit -à contrario d’un État policier- se défini comme «un système institutionnel dans lequel la puissance publique est soumise au droit». Apportant une précision essentielle, Hans Kelsen, juriste autrichien du début du 20e siècle, y ajoutera la notion de hiérarchie des normes afin de donner une plus grande cohérence au système. Aussi l’édifice présuppose trois impératifs pour être efficient, à savoir: La hiérarchie des normes, l’égalité de tous les citoyens devant la règle de droit, et l’indépendance du système judiciaire. Certes, si le modèle reste en partie théorique il n’en demeure pas moins que les régimes qui se veulent démocratiques doivent mettre en œuvre ce type d’organisation afin que les droits fondamentaux des citoyens soient objectivement garantis [1]. Force est de constater que, même si le modèle reste perfectible, des progrès incontestables ont été réalisés depuis la fin des principaux régimes monarchiques. Mais, il faut aussi se souvenir que l’existence de tels principes fondamentaux n’aura pas empêché au fascisme de prospérer en Europe, ni aux dictatures communistes de régner sans partage sur une grande partie du monde des décennies durant. En outre, nombre de nations contemporaines font fi de ces règles essentielles pourtant admises par une large majorité d’États, foulant aux pieds les libertés individuelles les plus vitales.
Pour autant, le présent rapport s’attache ici à démontrer que c’est cet ensemble complexe, nommé démocratie, qui se trouve aujourd’hui menacé à certains égards lorsqu’il s’agit de lutter contre les affres du terrorisme international, plus particulièrement islamiste, puisque largement stigmatisé depuis le 11 septembre 2001. Rappelons-nous en premier lieu les lois d’exceptions votées par l’administration Bush au lendemain des attentats [2], alors que le peuple américain dans sa grande majorité acquiesçait largement ce rétrécissement de ses libertés individuelles car la sûreté de la nation était menacée. Pire encore, suite à une propagande politique bien menée, la nation américaine dans sa grande majorité a, de fait, ratifié le droit d’envahir les nations déclarées ennemies. C’est d’ailleurs ici le socle sur lequel repose toute la dialectique du discours contre-terroriste qui vend au peuple plus de sécurité pour tous contre moins de libertés individuelles pour chacun, et le sujet de droit de se soumettre bien volontiers à cela en oubliant bien vite que tous les outils juridiques existaient en amont pour arriver à combattre ce front [3]. À ce titre, Arthur Chaskalson de rappeler que «Les normes juridiques adoptées avant le 11 septembre restent extrêmement solides, efficaces et parfaitement adaptées pour répondre aux menaces actuelles», et que s’il n’est pas question de mésestimer la lutte contre le terrorisme, toutefois ce dernier de souligner avec force que «les mesures qu’ils ont adoptées constituent des atteintes aux droits de l’homme bien plus graves qu’on ne pourrait l’imaginer».
Déjà, en 2005, Nicholas Howen, alors secrétaire général du la CIJ, redoutait un effondrement de certaines démocraties sous couvert de la lutte contre le terrorisme. Et les exemples sont nombreux, ce dernier évoquant les cas emblématiques de la Colombie ou du Népal, deux États qui luttent au moyen de lois d’exceptions contre certaines franges d’opposition armée à leur régime. Mais, Nicholas Howen d’évoquer aussi l’assimilation de certains mouvements sociaux à des agissements terroristes comme ce fût le cas en France pour l’affaire du détournement des ferries Corsica. Depuis, d’autres situations similaires ont pu confirmer cette crainte, et c’est aussi ce que met en avant le rapport rendu la semaine dernière.
Bien évidemment, l’illustration extrême des dérives commises au non de la lutte contre le terrorisme s’incarne diaboliquement dans les deux centres de rétentions les plus célèbres gérés par l’administration nord- américaine: Guantanomo et Abou Graïb. Tortures, humiliations, procédure et droit d’exception, opacité et autres perversions d’un système abjecte, inhumain, et outrepassant largement toutes les limites posées par un État de droit. De plus, et chacun le sait, quantité de personnes qui sont, ou ont été détenues dans ces lieux, sont complètement innocentes. C’est notamment le cas de Binyam Mohamed, éthiopien détenu à Guantanamo pendant plus de quatre années sans raison aucune, et remis en liberté ce-jour. Par ailleurs, la situation de la prison de Bagram , située sur le territoire afghan demeure tout aussi préoccupante puisque l’administration Obama vient de signifier son refus d’octroyer aux détenus le droit de contester leur détention devant une juridiction civile.
Dans ce sens, Mary Robinson, qui préside actuellement aux destinées de la CIJ, affirme avec gravité «qu’une atmosphère de secret entoure la détention et l’interrogatoire des personnes soupçonnées d’activités terroristes, ce qui favorise le recours à la torture et aux mauvais traitements et que partout dans le monde, les services de renseignement ont acquis un pouvoir grandissant, et ils sont souvent dispensés de rendre des comptes. Un accès rapide aux tribunaux et aux avocats doit être garanti pour éviter de tels abus». Cela ne saurait être contesté et l’affaire récente de Tarnac corrobore tout à fait cet état de fait. Julien Coupat, le principal protagoniste reste à ce-jour encore embastillé, car mis en examen suite à une inculpation pour «direction d’une structure terroriste», alors que le principal témoignage à charge est frappé du sceau de la mythomanie. Aussi, la France n’est pas en reste en matière de lois liberticides dictées par l’impérative lutte contre le terrorisme rampant.
Alors, il nous faut rappeler avec force les propos tenus devant la presse par ce collectif de juristes internationaux: «Lutter contre Al-Qaida n’implique pas de tordre le cou aux droits fondamentaux. Il est capital d’adapter les lois liées à la lutte contre le terrorisme aux normes internationales. Les gouvernements, même les plus démocratiques, s’en sont dangereusement éloignés depuis les attaques du 11 septembre 2001. Il est aujourd’hui urgent de redresser le cap afin d’éviter des dégâts irrémédiables». Ainsi, les événements récents du Proche-Orient démontrent toute l’actualité de ce propos, l’État israélien ayant largement dépassé ses prérogatives au prétexte de lutter contre le mouvement Hamas désigné comme terroriste, et cela avec le soutien sans équivoque des deux assemblées législatives américaines [4].
Puis, les juristes scrutateurs de nous renvoyer aux conclusions sévères, et recommandations essentielles, faites au chapitre 7 de leur rapport, afin de préserver les libertés fondamentales du plus grand nombre.
Avant tout, «les éminents juristes» rappellent l’importance du droit international en insistant sur la validité de la déclaration universelle des droits de l’homme, mais aussi du droit humanitaire pour gérer et réguler les conflits entre les nations, alors qu’ils déplorent l’érosion de ces deux sources juridiques.
En outre, ils insistent sur l’impérieuse nécessité de respecter les principes du droit pénal commun auquel doivent se soumettre les différents services de renseignements dont le fond de commerce est essentiellement alimenté par les conflits de basse intensité. Par ailleurs, le panel de juristes insiste sur la nécessité d’une transparence minimum des procédures tout en stigmatisant la concentration excessive du pouvoir dans les mains de l’exécutif. Puis, dans leurs conclusions, les juristes internationaux évoquent le rôle indispensable que doivent jouer les systèmes judiciaires, ainsi que tous les professionnels de la justice, dans le traitement des affaires de terrorisme, sans oublier la société civile qui doit aussi s’impliquer dans cette matière, notamment en informant le public.
In fine, les spécialistes de décliner leurs conclusions sous la forme de 9 recommandations faites aux États, ainsi qu’aux instances internationales, afin de réparer les dommages causés mais encore de prévenir toute nouvelle dérive que pourrait justifier la lutte contre le terrorisme.
C’est donc un travail essentiel que viennent de livrer au monde ces juristes impartiaux, même s’il faut reconnaître que l’ouvrage n’a pas force de loi, toutefois son poids moral et historique ne saurait être désormais nié. De plus, n’est-on pas en droit de se demander si, au rang des insanités de ce monde, le terrorisme figure vraiment en haut du tableau?
Hans Lefebvre
[1] État de droit:
http://www.aix-mrs.iufm.fr/formations/filieres/ecjs/productionaixprem/etatdroit.html
http://www.droitconstitutionnel.net/etatdedroit.html
[2] USA Patriot act voté le 25 octobre 2001
[3] La constitution: une arme efficace dans la lutte contre le terrorisme? Carolina Cerda-Guzman
[4] Lire l’éditorial de Serge Halimi intitulé « Abandon de peuple », in Le Monde diplomatique, février 2009.
Articles en lien:
Conférence d'Alain Gresh : L’évolution au Moyen-Orient entre Etats-Unis et Europe
Une bien pauvre justice française
Internet sous surveillance
Le mariage de Sarkozy troublé par l’ambassadeur israélien
Sarkozy champion des désintégrations / discrimination des musulmans
You are subscribed to email updates from La Petite République To stop receiving these emails, you may unsubscribe now.
Email delivery powered by Google
Inbox too full? Subscribe to the feed version of La Petite République in a feed reader.
If you prefer to unsubscribe via postal mail, write to: La Petite République, c/o Google, 20 W Kinzie, Chicago IL USA 60610
Subscribe to:
Posts (Atom)

